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Friday, 26 September 2025

इबादतखाना (कहानी) Ibadat Khana Story in Hindi

 

इबादतखाना

रचनाकार:

टीपू सलमान मख़दूम

पंजाबी से अनूदित

 

 


1581

फ़तेहपुर सीकरी

अकबर की पुर्तगाली महारानी मारिया उसकी गोद में बैठी छेड़छाड़ में मसरूफ़ थी। अकबर का मन उसे छोड़कर जाने को कतई नहीं चाह रहा था, मगर जाना भी अनिवार्य था; इबादतखाना में सारा आलम उसका इंतज़ार कर रहा था।

"बस करो जान-ए-मन, अब मुझे जाने दो। आज की रात मुझे इबादतखाने में गुज़ारनी है।" मुग़ल शहंशाह अकबर ने प्यार से मारिया के लचीले और कोमल नग्न पार्श्व पर हाथ रखकर उसे एक ओर करने का प्रयास किया।

Monday, 15 September 2025

अज़ दिल्लई ता पालम (कहानी)

 अज़ दिल्लई ता पालम

लेखक

टीपू सलमान मख़दूम

 पञ्जाबी से तर्जुमा




1803ء

1803ء का साल दुनिया की तारीख़ में एक अजीब साल था। यूरोप में नेपोलियन अँग्रेज़ों के साथ जंगें लड़ रहा था और दुनिया के दूसरे कोने में अमरीका की सुप्रीम कोर्ट ने "मारबरी बनाम मेडिसन" के मुक़द्दमे में फ़ैसला दिया कि अगर हुकूमत आईन के ख़िलाफ़ कोई क़ानून बनाए तो अदालतें इस क़ानून को रद्द कर सकती हैं। 

यही वो साल था जिस में दिल्ली का लाल क़िला उदास दिखाई देता था। कमज़ोर, लाचार और बूढ़ा। इस की अज़ीम-उश-शान दीवारें और आली शान मीनार भादों की चमकीली धूप में भी फीके पड़े थे। मराठों ने अँग्रेज़ों से जंग हार कर शहंशाह-ए-हिंदुस्तान को कंपनी बहादुर की पनाह में दे दिया था और अब शहंशाह-ए-हिंदुस्तान का वज़ीफ़ा कंपनी बहादुर ने देना था। ये ख़बर मिलने पर शाह आलम ने ज़म्रुद से कहा था कि वो सलजूक़ वज़ीर-ए-आज़म निज़ाम-उल-मुल्क तूसी की अज़ीम किताब "सियासत-नामा" में से बादशाह को वो वाक़िआ सुनाए जिस में जंग-ए-बलख़ हार कर उमर बिन लैस ने सिर्फ़ इतना कहा था कि "सुबह में अमीर था, और शाम को असीर"। 

Saturday, 21 June 2025

एक दिन (कहानी)

एक दिन

टीपू सलमान मखदूम

(पंजाबी से अनुवादित)

 

 


उसने टाई पकड़कर अपने गले में कसी और गांठ बांधने से पहले, उसने अपना फोन उठाया और उबर से टैक्सी बुलाई। ऐप ने किराए का अनुमान चार सौ से साढ़े चार सौ रुपये के बीच लगाया। जोहर टाउन से माल रोड तक की यात्रा लगभग तेरह या चौदह मील होगी। एक आरामदायक, वातानुकूलित कार को उसे घर से उठाना था और पूरे सम्मान के साथ ठीक उसी जगह पहुंचाना था जहाँ वह चाहता था। वह, मालिक, पीछे और ड्राइवर, सामने विनम्रता से। ऐसे भ्रमण के लिए चार सौ रुपये शायद ही अधिक थे। ऐप ने संकेत दिया कि कार तीन मिनट में आ जाएगी। उसने अपना फोन मेज पर रखा, जल्दी से अपनी टाई बांधी, मोज़े और जूते पहने, अपना कोट पहना, एक जेब में बटुआ और दूसरी में फोन डाला, और बाहर निकल गया। जिस पल वह बाहर निकला, उसका सामना माली से हो गया।

Monday, 29 March 2021

क़ानून की हुक्मरानी

 क़ानून की हुक्मरानी

 लिखारी

मख़दूम टीपू सलमान (लाहौर)




क़ानून की हुक्मरानी किसी भी इन्साफ़ पर खड़े समाज को बनाने के लिए ज़रूरी है। क़ानून की हुक्मरानी का मतलब है कि रियासत में हर काम क़ानून के तहत और क़ानून की मर्ज़ी के मुताबिक़ होगा। हकूमत क़ानून के मुताबिक़ चलेगी और हर फ़ैसला क़ानून के मुताबिक़ होगा। यानी इन्साफ़ का मयार ये होगा कि फ़ैसला क़ानून की मरज़ी से हो। देखने की बात ये है कि ऐसा क्यों और कैसे किया जाता है।

            क़ानून की हुक्मरानी की दो बुनियादी ज़रूरतें होती हैं। क़वानीन का होना और क़वानीन की बरतरी।