इबादतखाना
रचनाकार:
टीपू सलमान मख़दूम
पंजाबी से अनूदित
1581
फ़तेहपुर सीकरी
अकबर की पुर्तगाली महारानी मारिया उसकी गोद में बैठी
छेड़छाड़ में मसरूफ़ थी। अकबर का मन उसे छोड़कर जाने को कतई नहीं चाह रहा था, मगर जाना भी अनिवार्य था; इबादतखाना में सारा आलम उसका इंतज़ार
कर रहा था।
"बस करो जान-ए-मन, अब मुझे जाने दो। आज की रात मुझे इबादतखाने में गुज़ारनी है।" मुग़ल शहंशाह अकबर ने प्यार से मारिया के लचीले और कोमल नग्न पार्श्व पर हाथ रखकर उसे एक ओर करने का प्रयास किया।



